बागी़ 42 ही क्यों? : सच कहना यदि बगावत है तो समझों बागी हैं हम!

सुशील कुमार वर्मा/ लंबी गुलामी से मुक्ति पाने के लिए जब हमारे पुरखों ने 1857 में पहला स्वतंत्रता संग्राम शुरू किया, तो इस देश पर शासन कर रहे ब्रिटिश हुक्मरानों ने उसे बगावत की संज्ञा दी. बाद में 1921 और 1942 के आंदोलनों में भी इस देश के राष्ट्रभक्त रणबाकुरों को इसी संज्ञा से संबोधित किया जाता रहा. जाहिर सी बात है कि हम या आप जब भी सत्य के लिए अथवा अपने सही हक और हकूक के लिए आवाज बुलंद करते हैं, तो सत्ता की कुर्सियों पर बैठे देशी या विदेशी क्रूर शासकों को उस आवाज को दबाने का यही एक मात्र रास्ता दिखाई देता है. सत्य के लिए लडऩे वाले को विद्रोही अथवा बागी़ की संज्ञा देकर उनका दमन करना.

इतिहास साक्षी है कि आजादी के संघर्ष के दौरान ही राष्ट्रीय स्वाधीनता संग्राम में तमाम ऐसे लोग भी शामिल हो गए थे, जिनका लक्ष्य ऐन-केन प्रकारेण आजाद भारत की सत्ता हासिल करना ही था. ऐसे लोगों ने न केवल आजादी की लड़ाई में सर्वस्व लूटा देने वाले क्रांतिकारी रहनुमाओं चन्द्रशेखर आजाद, भगत सिंह, सुखदेव, पं.राम प्रसाद बिस्मिल, वीर सावरकर, मंगल पाण्डेय, कौशल कुमार, हेमू कलानी, चित्तू पाण्डेय जैसे हजारों देश भक्तों की उपेक्षा और उनके योगदानों व बलिदानों को इस देश की नवजवान पीढ़ी की स्मृतियों से विस्मृत करने की भरपूर कोशिश की, बल्कि निजी ईष्या अथवा हीनभाव से ग्रसित होकर अल्लामा इकबाल और मोहमद अली जिन्ना जैसों को अपनी प्रतिहिंसा में देश विरोधी मार्ग अपनाने पर मजबूर कर दिया.

नौजवानों को क्यों नहीं बताई जाती देश के आजादी की सच्ची गाथा?
इतना ही नहीं इतिहास साक्षी है कि नेता जी सुभाष चन्द्र बोस को किन मजबूरियों में सशस्त्र संघर्ष की राह अपनाने को विवश होना पड़ा. लाखों ऐसे लोग जिन्होंने आजाद भारत से बिना किसी मुआवजे अथवा लाभ की कामना किए, अपने प्राणों की आहुति दी थी, वे आज कहां हैं? उनके पराक्रम की गौरव गाथा कहां है? इस देश के नवजवानों को क्यों नहीं बताया जाता देश की आजादी की सच्ची गाथा? हजारों साहित्यकारों की रचनाएं प्रकाश में आनेे से पूर्व गुलाम भारत में जब्त होती रही, उन्हें आजाद भारत में क्यों नहीं लोगों के सामने आने दिया गया. ऐसा तो नहीं कि केवल एक खानदान को ही इस देश को आजाद कराने और सत्ता का सुख भोगने का तमगा देने के लिए नियोजित ढ़ंग से ऐसा किया गया हो?

…और जब गांधी ने कहा हमारी लाश पर बनेगा पाकिस्तान
आखिर क्या कारण था कि महात्मा गांधी के यह कहने के बावजूद की पाकिस्तान हमारी लाश पर बनेगा, पं. नेहरू ने भारत का विभाजन स्वीकार कर पाकिस्तान का निर्माण मंजूर कर लिया और सिर कटाकर सिरदर्द की दवा लेने का काम किया? वही पाकिस्तान आज भारत के लिए नासूर बन चुका है. जबकि यदि हमारे ये नेता थोड़ा भी दूरदर्शी और अपनी महत्वाकांक्षा पर नियंत्रण रखने वाले होते तो जिन्ना को आजाद भारत का अंतरिम प्रधानमंत्री बनाकर देश विभाजन और लाखोंं लोगों का कत्लेआम रोक सकते थे. इतना ही नहीं 1948 में जम्मू कश्मीर पर हुए कबायली हमले का सच देश की जनता को बताने के बजाय, पाकिस्तान को इस काम के लिए उकसाने और आमंत्रित करने वाले को किसने और किन कारणों से पुरस्कृत किया. क्यों आजादी के बाद भी देश में तमाम ऐसी घटनाएं होती रहीं, जिनसे इस बात की आशंका और मजबूत होती है.

लोकतंत्र समर्थकों को जब राष्ट्र विरोधी बताकर जेल में डाला गया
गोवा, निजाम हैदराबाद, जम्मू कश्मीर आदि राज्यों को भारतीय संघ में शामिल करने के लिए सरदार बल्लभ भाई पटेल को तत्कालीन प्रधानमंत्री पं. जवाहर लाल नेहरू से कितना कुछ मतभेद झेलना पड़ा, इसकी पूरी सच्चाई सामने आनी ही चाहिए. आजाद भारत में भी अनेक बार ऐसे अवसर आये हैं, जब सत्ताधारियों ने सच का गला घोटने के लिए सही मायने में राष्ट्रप्रेमियों और लोकतंत्र समर्थकों को समाज विरोधी और राष्ट्रविरोधी बता कर जेल की सलाखों के पीछे डाला और उनके चमचों ने नारा दिया ‘इन्दिरा इज इंडिया और इंडिया इज इंदिरा’. 1975 की वह घटना जिसने देश के लिए अपना सर्वस्व न्यौछावर कर देने वाले लोकनायक जयप्रकाश नारायण, मोरार जी देसाई, प्रो. बलराज मधोक, लोकबन्धु राजनारायण, चौधरी चरण सिंह सहित लाखों राष्ट्रप्रेमियों व लोकतंत्रवादियों को जेल की काल कोठरी में पहुंचा दिया था, अभी भी देश के तमाम लोग भुले नहीं होंगे. सत्ता के लालचियों ने इन राष्ट्र प्रेमियों को भी बागीं ही मान कर ऐसा क्रूर कदम उठाया था, ताकि सत्ता पर उनका मौरूसी अधिकार बना रहे.

तानाशाह सरकार ने बागी 42 के प्रकाशन पर लगाई थी रोक, संपादक को भेजा था जेल
ऐसे ही तमाम लोग आज भी कहते हैं कि भारत किसी के बाप का नहीं? कश्मीर किसी की बपौती नहीं? जून 1975 के कुछ माह पूर्व ही ऐसे ही राजनीतिक षडयंत्रों को बेनकाब करने और आजाद भारत में राष्ट्र प्रेम की भावना विकसित करने के उद्देश्य से गोरखपुर से प्रिंट मीडिया के जरिए ‘बागी़ 42’ हिन्दी साप्ताहिक का प्रकाशन शुरू हुआ था, लेकिन चन्द अंकों के प्रकाशन के बाद ही जुलाई 1975 में ही तत्कालीन तानाशाह सरकार के निर्देश पर इस पत्रिका के प्रकाशन पर न सिर्फ रोक लगा दी गई, बल्कि इसके संपादक को जेल की यात्रा भी करनी पड़ी. बहरहाल अब उसी शीर्षक www.baaghi42.in  से इसे डीजिटल मीडिया के जरिए शुरू किया गया. इसका साफ मकसद है आजादी के पूर्व और आजादी के बाद भारतीय शासकों द्वारा की गई ऐतिहासिक भूलों के साथ ही सच को यथासंभव सामने लाना, और देश में राष्ट्रप्रेम व भारतीय संस्कृति की भावना को मजबूत करते हुए किसी जाति, धर्म, संप्रदाय में भेदभाव किये बिना तमाम तरह की आर्थिक, राजनीतिक, सामाजिक विसंगतियों व अन्यायों के खिलाफ जोरदार आवाज बुलंद करते हुए एक निर्भीक और सबके लिए खुला मंच प्रदान करना. साथ ही जाति, संप्रदाय विहीन ऐसा भारतीय समाज जिसमें समरसता और सामाजिक न्याय के साथ हर कोई महज भारत, भारतीयता की भावना से लबरेज हो राष्ट्र के विकास एवं सशक्तिकरण में अपना योगदान दे सकें.