सवर्ण आरक्षण पर राष्ट्रपति ने लगाई मुहर, आठ लाख आय सीमा पर सोशल मीडिया पर जंग

आज आठ लाख पर आठ-आठ आंसू क्यों?

गोरखपुर : लोकसभा, राज्यसभा के बाद राष्ट्रपति ने भी सवर्णों के 10 % आर्थिक आरक्षण पर मुहर लगा दी. इसके बाद एक बार फिर इसे लेकर तरह-तरह की चर्चाओं का दौर शुरू हो गया है. इनमें सबसे अधिक सवाल इस बात को लेकर उठाया जा रहा है कि जब सवर्ण आरक्षण के लिए आय सीमा आठ लाख है तो इनकम टैक्स भरने के लिए क्यों न यही सीमा कर दी जाए? यह मांग सोशल मीडिया पर खूब हो रही है. इस पर हम कुछ कहें, उसके पहले आइए इस सम्बंध में आपकी जानकारी तो दुरुस्त करा दें.

देश में सरकारी नौकरियों और शिक्षण संस्थानों में ओबीसी के लिए 27 प्रतिशत आरक्षण है, यह तो आप जानते ही होंगे. अब यह भी जानिए कि इस आरक्षण के लिए 1993 में सालाना वार्षिक आय की सीमा एक लाख रुपये निर्धारित की गई थी. साल 2004 में आय सीमा बढ़ाकर 2.5 लाख रुपये की गई. फिर 2008 में 4.5 लाख रुपये हो गई। 2013 में तो इसे छह लाख रुपये कर दिया गया. यहां तक की दरियादिली मनमोहन सरकार की थी, फिर तो नई सरकार को भी कुछ करना ही था. बस क्या! 2017 में मोदी सरकार ने इस आय सीमा को आठ लाख रुपये कर दिया.

… हां तो अब बताइए, आपने इस पर किया था कभी कोई सवाल? फिर ध्यान दीजिए कि यही मोदी सरकार यदि आठ लाख वार्षिक आय वाले ओबीसी को आरक्षण देती है, तो फिर आठ लाख आय वाले सवर्ण को देने का फैसला लिया तो इतना बवाल क्यों? अरे भाई! यदि सवर्णों को आप नहीं देख नहीं पा रहे तो आंखें फोड़ लीजिए न अपनी, लेकिन इस तरह दोहरापन से तो मत देखिए जैसे कि अब तक देश के नेता देखते आए हैं, कि एससी-एसटी से लेकर ओबीसी तक को सरकारी सुविधा मिले तो ठीक, स्वागत हो उसका और सवर्ण को मिल जाए तो गलत, मातम मने उस पर। हां, एक सवाल आपका अब भी हो सकता है कि ओबीसी आरक्षण तो जाति आधारित है लेकिन सवर्ण आरक्षण आर्थिक आधार पर होने के बाद भी गरीबी की सीमा आठ लाख क्यों? …तो भाई मेरे, यदि आठ लाख की आय वाला सवर्ण गरीब नहीं है तो आठ लाख की आय वाला ओबीसी भी पिछड़ा कैसे है? 63 हजार प्रति महीना कमाने वाला गरीब नहीं होता तो वह पिछड़ा भी कैसे होता है भाई? यदि यह आठ लाख की सीमा सवर्ण के लिए गलत है तो ओबीसी के लिए सही कैसे है? है कोई जवाब? रहने दीजिए, मन में मैल बहुत है, जवाब नहीं दे पाइएगा…।

खैर… आइए, अब थोड़ी एससी-एसटी आरक्षण की भी चर्चा कर लेते हैं, नहीं तो ओबीसी वाले भाई नाराज न हो जाएं कि इस मनुवादी ने सिर्फ उन्हें ही निशाने पर रखा, इनकी कारगुजारियां तो बताई ही नहीं। … हां तो आरक्षण पर आप अपनी जानकारी थोड़ी और बढ़ाइए और जान लीजिए कि एससी-एसटी को आरक्षण देने के लिए तो आठ लाख भी कुछ नहीं है, न ही आठ करोड़ या आठ अरब-खरब-नील-पदम्-शंख-महाशंख…। धरती से आकाश तक कोई सीमा नहीं। 5000 वर्षों के शोषण का इतिहास इतना रट्टा मार पढ़ाया गया है कि इनका वर्तमान देखने की तो कोई जरूरत ही नहीं है। अभी तो हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने प्रोन्नति में आरक्षण मसले पर जब सरकार से इस समाज को दिए आरक्षण व प्रतिनिधित्व के बारे में आंकड़ा मांगा तो मोदी सरकार ने भी कह दिया था कि हुजूर! यह 1000 वर्षों का शोषित समाज है, इसे प्रोन्नति में आरक्षण दिया जाना चाहिए। माने इस समाज की मौजूदा स्थिति देखने की कोई जरूरत नहीं। सरकार तक इतिहास का ही हवाला दे रही है। अरे हां, सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने यह भी सवाल तो पूछा था कि जब ओबीसी के लिए क्रीमीलेयर है तो एससी-एसटी के लिए क्यों नहीं होना चाहिए? यदि कोई आरक्षण से पद पाकर, प्रोन्नत होकर मुख्य सचिव बन जाता है तो क्या उसके बेटे को भी दलित समझते हुए ही आरक्षण और फिर प्रोन्नति में आरक्षण देना सही है? सुप्रीम कोर्ट के इस सवाल पर भाजपा ही नहीं, देश की सभी पार्टियों को सांप सूंघ गया था। सरकार की हिम्मत नहीं हुई कि आठ लाख की भी सीमा निर्धारित कर दे जो कि अभी सवर्णों के लिए तय किए जाने पर बहुतों के लिए बहुत बड़ी राशि हो गई है।

… तो आप समझ गए न? ओबीसी के लिए आरक्षण लेने के लिए भी सवर्णों की ही तरह आठ लाख वार्षिक आय की सीमा है तो वहीं एससी-एसटी के लिए यह सुविधा लेने के लिए कोई सीमा ही नहीं है, माने बस जाति ही काफी है। इस जाति के किए आरक्षण का नियम इतना बेमिशाल है कि मायावती भी आरक्षण की हकदार हैं और रामविलास पासवान भी दलित-शोषित हैं। अब सही ही तो है, इनसे दलित-शोषित व्यक्ति कोई देश में है भला?

… तो अब बताइए न कि वर्षों से एससी-एसटी से लेकर ओबीसी तक को दिया जा रहा आरक्षण सवर्ण को दिए जाते ही अचानक गलत कैसे हो गया मेरे भाई? और यदि गलत है तो सब गलत है न? और यदि सब गलत है तो एक स्वर में मांग कीजिए न कि देश में यह भ्रष्ट आरक्षण व्यवस्था ही समाप्त कर दी जाए। यकीन मानिए हर सवर्ण अपना यह नया-नवेला आरक्षण छोड़कर साथ खड़ा होगा आपके। और हम? हम तो हैं ही आरक्षण विरोधी। मेरी तो शुरू से ही मांग है कि कोई गरीब है तो सरकार उसे फ्री में रोटी दे, चाहे तो एक तय राशि भी यूँ ही दिया करे लेकिन जब नौकरी दे तो वही दे जिसके कि वह योग्य है। इस समय आरक्षण अयोग्यता का पर्याय बन चुका है और इस तरह की व्यवस्था ने देश को जितना नुकसान पहुंचाया है, किसी तरह अव्यवस्था ने भी नहीं पहुंचाई। मौजूदा आरक्षण देश की मेधा को हतोत्साहित कर रहा है और अयोग्य को प्रोत्साहित कर रहा है। इसका खत्म हो जाना ही देशहित में है। … तो बताइए आप हैं न तैयार इस राक्षस के खात्मे के लिए जो देश को खा रहा है? यदि हैं तो समस्त आरक्षण व्यवस्था का ही विरोध कीजिए, न कि सवर्णों को आरक्षण दिए जाने का। हाँ, यदि दिक्कत आरक्षण से नहीं, सिर्फ सवर्णों से है तो रटते रहिए 5000 वर्षों के कथित शोषण का इतिहास, कथित मनुवाद, दोहराते रहिए सवर्ण आरक्षण के आठ लाख और बहाते रहिए आठ-आठ आंसू…।

यह लेख पत्रकार मृत्युंजय त्रिपाठी की फेसबुक वाल से लिया गया है. कुशीनगर निवासी मृत्युंजय देश के जाने-माने पत्रकार हैं और फिलहाल दैनिक जागरण, दिल्ली में कार्यरत हैं।