मनुरोजन यादव: छात्र राजनीति से लेकर पूर्वांचल की राजनीति में बनाई अपनी एक अलग पहचान

अतुल दूबे, गोरखपुर: पंरिदों को मंजिल मिलेगी यकीनन, यह फैले हुए उनके पंख बोलते हैं. जो रहते हैं अक्सर खामोश खुद लेकिन, जमाने में उनके हूनर बोलते हैं… जी हां, हम बात कर रहे हैं शहर के एक ऐसे शख्स की जोकि खुद में है एक मुस्कुराता चेहरा, उस पर गजब का आत्मविश्वास, आंखों में कामयाबी की दास्तान, दिल में कुछ कर कर गुजरने का जज्बा, जिंदगी संवारने के लिए अपने लक्ष्य की राहों से कभी न भटकने वाले बढ़ते कदम के साथ आसमान की बुलंदियों को छूने को बेताब समाजवादी पार्टी के नेेता मनुरोजन यादव की.

बेहद ही कम उम्र में छात्र राजनीति से लेकर पूर्वांचल की राजनीति में अपनी एक अलग पहचान बनाने वाले मनुरोजन यादव अब राजनीति से जुड़े युवाओं के लिए प्रेरणा स्रोत बन चुके हैं. गोरखपुर शहर में ऐसे विरले ही लोग होंगे जो अपने कैरियर के बजाय दूसरों की कैरियर संवारने में लगे हुए हैं. ऐसे ही लोगों में बेहद ही संजीदगी के साथ मनुरोजन का नाम सबसे ऊपर लिया जा रहा है.

समाज के लिए दांव पर लगा दिया खुद का कैरियर
गोरखपुर शहर के खोराबार इलाके के मिर्जापुर में एक गरीब मजदूर के घर जन्में मनुरोजन के संघर्ष की दास्तां तो काफी लंबी है, मगर कहा जाता है कि अगर दिल में कुछ कर गुजरने का जज़्बा हो तो, उसे कामयाब होने से रोका नहीं जा सकता. पांच बहन और दो भाईयों में सबसे बड़े होने के नाते मनुरोजन के कंधों पर परिवार की जिम्मेदारी तो काफी पहले ही आ चुकी थी, लेकिन इन सबके बीच वे शुरू से ही छात्र राजनीति से जुड़़े रहे और परिवार में भाई—बहनों के बेहतर परवरिश के साथ ही समाज के लिए कुछ बेहतर करने की इच्छा हमेशा से ही मन में रखते रहे और अंतत: एक गरीब मजदूर के इस बेटे ने हंसते मुस्कुराते हुए अपनी सभी जिम्मेदारियों का बखूबी निर्वहन किया. सिर्फ खुद को ही अपने पैरों पर मजबूत तरीके से खड़ा ही नहीं किया बल्कि शुरूआत में तो अपने कैरियर को दांव पर लगाकर कभी समाज के लिए कुछ करने तो कभी अपने भाई—बहनों के कैरियर को संवारने में लग गए.

पंचायत चुनाव में दे रहे कड़ी टक्कर
पढ़ाई के दौरान शुरू से काफी होनहार रहे मनुरोजन ने ऐसे तो एलएलबी की पढ़ाई की. मुझे शायद आज किसी और फिल्ड में होना था, लेकिन किस्मत को कुछ और ही मंजूर था. उनका समाज के दबे—कुचले और गरीबों के प्रति कुछ करने का लगाव उन्हें राजनीति में आने पर मजबूर कर दिया. हालांकि राजनीति में कदम रखने के बाद उन्हें वर्ष 2017 के विधानसभा चुनाव में चौरीचौरा से सपा प्रत्याशी के रुप में हार का भी सामना करना पड़ा, लेकिन उनके हौसलों ने उन्हें हारने नहीं दिया और वे एक बार फिर राजनीति में कड़ी मेहनत करने लगे. लिहाजा मौजूदा पंचायत चुनाव में वार्ड नंबर 65 से बतौर समाजवादी पार्टी के जिला पंचायत सदस्य प्रत्याशी के रूप में कड़ी टक्कर दे रहे हैं.

समाज के लिए कुछ बेहतर करना है सपना
मनुरोजन बताते हैं कि जब पहली बार वे चुनाव मैदान में उतरे थे तो पहले वे थोड़ा हिचके. शुरुआती दौर में हार—जीत के परिणाम का सामना करना थोड़ा मुश्किल लगा, लेकिन जीवन के संघर्षों को याद कर धीरे-धीरे वह इसमें इस कदर रम गए कि उन्हें अपने कैरियर की परवाह ही नहीं रही. अगर कुछ चाहत हैै तो वह है समाज के लिए कुछ बेहतर करना. चाहे वह किसी पद पर रहकर करें या फिर बगैर पद. हालांकि उनका यह भी मानना कि अगर समाज के एक बड़े वर्ग के लिए कुछ सकारात्मक करना हो तो उसके लिए राजनीति का रास्ता अख्तियार करना बेहद जरूरी है. क्योंकि बिना राजनीति से जुड़े एक बड़े वर्ग का बीड़ा उठाना किसी के लिए संभव नहीं हो सकता.

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जमीन से जुड़े होने की वजह है मनुरोजन की लोकप्रियता
हालांकि मनुरोजन यादव का नाम किसी पहचान का मोहताज नहीं है. यह नाम पूर्वांचल की राजनीति में युवाओं की पहली पसंद और साफ—सुथरी छवि के लिए लिया जाता है. यही वजह है कि मनुरोजन यादव की लोकप्रियता दिन ब दिन बढ़ती जा रही है. इसका एक बड़ा कारण यह भी है कि मनुरोजन शुरू से ही जमीन से जुड़े व्यक्ति हैं. लिहाजा वे किसी का भी सुख हो या दु:ख उसमें शामिल जरूर होेते और लोगों की अपने स्तर से हर यथासंभव मदद भी करते. ऐसे तो मनुरोजन यादव युवाओं में काफी अधिक पसंद किए जाते हैं, लेकिन वे अपने कुशल व्यवहार और सरल स्वभाव से हर वर्ग केे लोगों के बीच अपनी एक अमीट छाप स्थापित कर चुके हैं.

पत्नी ने दिया साथ तो छूने लगे आसमान
वहीं, परिवार को स्थापित करने और खुद को मुकाम देने के लिए भी मनुरोजन ने अपनी लाइफ में कई समझौते किए. कैरियर बनाने की उम्र में खुद को समाज के लिए समर्पित कर दिया. वहीं, वर्ष 2005 में शादी के बाद उनकी पत्नी गीतांजलि यादव ने भी उनके साथ जुड़कर उनकी कामयाबी में चार—चांद लगा दिया. आज जहां मनुरोजन खुद पूर्वांचल की राजनीति में एक बड़ा नाम हैं, वहीं पत्नी गीतांजलि भी वर्ष 2015 में जिला पंचायत अध्यक्ष निर्वाचित होकर अपनी जिम्मेदारी बखूबी निभा रहीं हैं. मनुरोजन का कहना है कि अपने लिए तो सभी जीते हैं, लेकिन एक बार दूसरों के लिए जीकर देखिए, जिंदगी का मजा ही कुछ और होगा. यही वजह है कि पती और पत्नी दोनों राजनीति से जुड़कर समाज में एक नई रोशनी डालने में दिन रात लगे हैं. मनुरोजन का कहना है कि यूं तो जिंदगी खत्म हो जाती है, इसलिए ऐसा काम करना चाहिए कि जाने के बाद भी लोग याद रखें.

ऐसे रखा राजनीति में कदम
ऐसे तो मनुरोजन कॉलेज लाइफ से ही छात्र राजनीति और समाज से जुड़े रहते थे, लेकिन उनकी जिदंगी में एक ऐसी घटना हुई, जोकि उन्हें राजनीति में आने का रास्ता दिखा दिया. वे अपने शुरूआती संघर्षों को याद करते हुए बताते हैं कि 1998 की बात है. उनका गांव नदी के किनारे बसा हुआ है. नदी के सटे होने की वजह से हर साल आने वाले बाढ़ के दौरान पूरा गांव कटकर नदी में समाता जा रहा था. इससे पूरे गांव का अस्तित्व खतरे में आ गया. ऐसे में सिर्फ मनुरोजन ही नहीं बल्कि गांव के सैकड़ों परिवारों को वहां से पलायन करने की नौबत आ गई. फिर क्या था…उन्होंने उसी उम्र में आंदोलन का रास्ता अपना लिया. पहले खुद आगे बढ़े और अनशन शुरू किया, करीब नौ दिनों के लगातार आमरण अनशन को देखते ही देखते कुछ परिवार और फिर पूरा गांव उनके समर्थन में आ गया. धीरे—धीरे आंदोलन ने इतना बड़ा रूख अख्तियार कर लिया कि आखिरकार प्रशासन को उनके आगे झुकना ही पड़ा और फिर उनके गांव मिर्जापुर को नदी के बार्डर गांव के रूप में स्थापित कर दिया गया.

इसके बाद से ही गांव या क्षेत्र में कोई भी समस्या खड़ी होती तो लोग कहीं और नहीं बल्कि मनुरोजन के पास आते, फिर यही से उस समस्या के निस्तारण का रास्ता तय होता. ऐसे में उन्हें इस बात का खुद एहसास नहीं हुआ कि कब लोगों ने उन्हें अपना नेता मान लिया, लिहाजा हर किसी की समस्या सुनना और उनकी मदद को आगे आना ही उन्हें राजनीति में कदम रखने पर मजबूर कर दिया.

पुलिस उत्पीड़न का भी शिकार हो चुके हैं मनुरोजन
ऐसा नहीं है कि मनुरोजन यादव को राजनीति में शिकार नहीं बनाया गया. बल्कि वे भी छात्र राजनीति के दौरान पुलिसिया उत्पीड़न का शिकार हो चुके हैं. मनुरोजन बताते हैं कि छात्र राजनीति के दौरान वर्ष 2002 में खोराबार के एक ब्लाक प्रमुख की हत्या में उन्हें फर्जी तरीके से नामजद कर दिया गया था. ऐसे में उन दिनों में इस मामले में जेल की यात्रा भी करनी पड़ी. हालांकि बाद में वे इस मामले में बरी हो गए. उन्होंने बताया कि उनकी लगातार बढ़ती लोकप्रियता को देखते हुए ऐसा कई बार हुआ है कि उन्हें पुलिसिया उत्पीड़न का सामना करना पड़ा, लेकिन वे कभी इससे हार नहीं माने. बल्कि इससे लड़ते हुए आज पूर्वांचल की राजनीति में एक बड़ा नाम हासिल कर चुके हैं.

पूर्वांचल में अखिलेश यादव की पहली पसंद हैं मनुरोजन
इतना ही नहीं अगर सपा प्रमुख अखिलेश यादव की बात की जाए तो पूर्वांचल के लिए उनकी पहली पसंद मनुरोजन यादव ही हैं. यही वजह है कि मनुरोजन और उनके परिवार के लिए सपा प्रमुख अखिलेश यादव लगातार अपनी झोली खोले बैठे रहते हैं. शायद इसी का नतीजा है कि मनुरोजन ने पहली बार वर्ष 2010 में सपा से जिला पंचायत सदस्य का चुनाव जीता. इसके बाद उनकी पत्नी गीतांजलि यादव भी वर्ष 2015 में जिला पंचायत सदस्य और फिर जिला पंचायत अध्यक्ष भी चुनी गईं.

मनुरोजन और उनके परिवार के त्याग और परिश्रम का ही प्रतिफल है कि वे समाजवादी पार्टी के गोरखपुर से जिला उपाध्यक्ष और जिला महासचिव भी बनाए गए. इतना ही नहीं उनकी पत्नी गीतांजलि यादव को भी सपा सरकार के दौरान गोरखपुर विकास प्राधिकरण का सदस्य बनाया गया था. इसके साथ ही सपा ने वर्ष 2017 के विधानसभा चुनाव में मनुरोजन को चौरीचौरा विधानसभा से अपने प्रत्याशी के रुप में चुना और इस बार फिर जिला पंचायत सदस्य के लिए सपा प्रमुख ने मनुरोजन पर ही भरोसा जताया है.