इतिहास बदल नहीं सकते, इसलिए नया इतिहास रचिए…

गोरखपुर : इतिहास से खेलने वाले इतिहास में ही मिल जाते हैं इसलिए मत खेलो क्योंकि तुम्हारा भी होगा एक इतिहास और वह भी लिखा जाएगा… खिलाड़ी हो तो इतिहास से सीख लेकर वर्तमान की जमीन पर अच्छे भविष्य की बुनियाद रखो ताकि कोई नया इतिहास रच सको अन्यथा इतिहास जो है, उसे वही रहने दो। वह जो है, वह रहेगा… वही रहना भी चाहिए…! वह अच्छा है तो भी; बुरा है तो भी…

आप फिल्मकार हैं, साहित्यकार हैं, इतिहासकार हैं, पत्रकार हैं, लेखक विद्वान हैं, या राजनेता, सरकार हैं… इतिहास से छेड़छाड़ कतई न कीजिए. इस छेड़छाड़ का अधिकार नहीं है आपको. न तो इतिहास में की गई अपनों की गलतियां छुपाने की कोशिश करें और न ही किसी और की गलतियों को बढ़ा-चढ़ाकर दिखाने की. यदि इतिहास की पुस्तकों में कहीं कोई ज्यादती हुई है तो ढूंढिए इतिहास के साक्ष्य और लिखिए ऐसा इतिहास जिसमें सबकुछ हो. बिल्कुल वैसा, जब हुआ जैसा; जिसने किया वैसा। बस वैसे का वैसा….

इतिहास कोई कागज पर लिखे महज कुछ शब्द नहीं हैं जिन्हें जब चाहा मिटाकर अपने लिए अच्छा लिख लिया; दूसरे के लिए बुरा. यह गुजरा हुआ वह वक्त है जहां न तो हम जा सकते हैं, और न उसे बदल सकते हैं इसलिए किसी को भी ऐसा करने की धृष्टता नहीं करना चाहिए. न तो खिलजी के कारनामे बदले जा सकते हैं, न पद्मिनी का चरित्र; न ही किसी अन्य ऐतिहासिक चरित्र का चरित्र आप-हम तय कर सकते हैं. यदि पूर्वजों ने अच्छा किया तो भी स्वीकार; बुरा किया तो भी. इस पर लड़ने से कोई फायदा नहीं है; यह बस मूर्खता है. हम बस नया इतिहास रच सकते हैं, पुराने को बदल नहीं सकते इसलिए इस पर तर्क ही न करें… यदि मेरा कोई पूर्वज बलात्कारी था तो था, यदि कोई सन्त था तो था; उसे बदला नहीं जा सकता. हां, पूर्वज ही सही, हम उस बलात्कारी को कोसेंगे; न कि बचाव करेंगे. हम उस सन्त के गुण गाते हुए आगे बढ़ेंगे उसके मार्ग पर या उससे भी बेहतर मार्ग बनाएंगे ताकि आने वाली पीढियां नाज करें हम पर. कोई कलंकित करने वाला इतिहास न लिखा जाए हमारा….

किस बात पर लड़ाई है? क्या साबित करना चाहते हैं हम? कौन उन मुस्लिम शासकों का आतंक नहीं जानता जिन्होंने सिर्फ मंदिरों को तोड़कर मस्जिद खड़े किए और हिंदुओं को मुस्लिम बनाने में ही अपना पूरा शासन-काल बीता दिया? कौन नहीं जानता उन राजपूत शासकों को जो अपने स्वाभिमान के लिए लड़े, अपना मस्तक कटा दिए लेकिन कौन नहीं जानता उन राजपूत शासकों को भी जो सिर्फ ऐय्यासी में ही अपने दिन गुजार दिए, घुटने टेक दिए और इतिहास को कलंकित कर गए? कौन नहीं जानता उन ब्राह्मण विद्वानों को भी जो इन सबके पीछे रहे; हर पाप-पुण्य में भागी? कोई ऐसा है जिसकी समस्त पीढ़ियों ने सिर्फ अच्छा किया हो, बुरा कुछ भी नहीं? जिसके समाज में सब विद्वान, शूरवीर, चरित्रवान रहे हों?

जरा देखिए, क्या हमारा वर्तमान ऐसा है? इस समय मुस्लिम आतंकी नहीं हैं? ब्राह्मण कुल कलंक नहीं हैं? कायर राजपूत नहीं हैं? कभी अपना पसीना बहाकर अपने साथ दूसरों के लिए भी भोजन का प्रबंध करने वाले और आज मुफ्त में रोटी (आरक्षण) मांगने वाले दलित नहीं है? राजाओं के रूप में ऐय्यास नेता नहीं हैं? उनका साथ देने वाले भ्रष्ट अधिकारी नहीं हैं? कोई, किसी समाज से, जाति-धर्म से कोई चोर-उचक्का, बलात्कारी नहीं है? एक बार दस दिनों का अखबार उठाइये न और देखिए कि कौन बलात्कारी नहीं है? किसी के नाम में त्रिपाठी होगा, किसी में अंसारी, किसी में सिंह, और कुछ बिना उपनाम वाले भी नाम मिलेंगे…

अब सोचिए जरा… यदि इसे वर्तमान में नहीं बदला जा सकता तो जब यह सबकुछ इतिहास बन जाएगा तब हमारी आने वाली पीढियां आपस में लड़ें कि बदल दो यह इतिहास; यह लील रहा है हमारे पूर्वजों का स्वाभिमान, तो यह मूर्खता ही तो होगी? कुछ उनकी, कुछ हमारी। मित्रों, इतिहास पर आपस में तर्क-बहस, लड़ाई का कोई फायदा नहीं है। पूर्वजों ने जो किया है वही इतिहास है हमारा और जो आज हम हैं, वही हमारे बाद का इतिहास होगा हमारी आने वाली पीढ़ियों के लिए…. यह बदला नहीं जा सकता इसलिए इसकी कोशिश ही न करें. इतिहास की बातों को लेकर लड़ने से ज्यादा बेहतर है कि हम आने वाले उस भविष्य की चिंता करें जब हमारा इतिहास लिखा जाएगा…. सोचा है कभी कि इतिहास की पृष्ठभूमि लिखे जानेभर की सामग्री भी हम दे पा रहे हैं? कोई इतिहास होगा हमारा? और लिखा भी जाएगा तो क्या लिखा जाएगा? यही सब? फिर नाज करेगी ना आने वाली पीढियां हम पर…?

यह लेख युवा पत्रकार मृत्युंजय त्रिपाठी की फेसबुक वाल से लिया गया है,लेखक देश के माने जाने वरिष्ठ पत्रकार हैं.देश के कई समाचार संस्थानों को सेवाएं दे चुके मृत्युंजय फिलहाल दैनिक जागरण में कार्यरत हैं.