हरितालिका तीज: जानें इसके महत्व और पूजा विधि

हरतालिका तीज व इसके व्रत का भारत में विशेष महत्व है। इस व्रत में महिलाएं अखंड सौभाग्य की प्राप्ति के लिए माता पार्वती और भगवान शिव की अराधना करती हैं। हरितालिका तीज व्रत कुंवारी और सौभाग्यवती महिलाएं करती हैं। भाद्रपद मास की शुक्ल पक्ष की तृतीया को हस्त नक्षत्र में भगवान शिव और माता पार्वती के पूजन का विशेष महत्व है। हरितालिका तीज व्रत निराहार और निर्जल किया जाता है।

कुंवारी युवतियां मनचाहे जीवनसाथी की कामना से व्रत करती हैं। साथ ही जिन कन्याओं का विवाह लंबे समय से नहीं हो पा रहा है वह भी अगर हरितालिका तीज व्रत करती हैं तो जल्द ही उनके विवाह के योग बन जाते हैं। इस वर्ष यह व्रत 21 अगस्त 2020 को है।तृतीया तिथि की शुरुआत शुक्रवार की भोर मेें 04.14 में होगा। व्रती महिलाएं शुक्रवार की सुबह से रात 1 बजकर 59 मिनट तक यानी पूरे दिन व्रत रखकर और अगले दिन शनिवार की सुबह स्नान करने के बाद पारण कर ले। हरतालिका पूजा के लिए सुबह का समय बहुत शुभ माना जाता है। हालांकि यदि किसी कारणवश यदि प्रातः काल के मुहूर्त में पूजा नही हो पाती है तो फिर प्रदोषकाल में पूजा की जा सकती है। हरतालिका तीज पर पूरा दिन निर्जल व्रत रखने के बाद शाम के समय चौकी पर मिट्टी के शिव-पार्वती व गणेश जी की पूजा की जाती हैं।दूसरे दिन सुबह गौरी जी से सुहाग लेने के बाद व्रत तोड़ा जाता है।


स्त्रियां व्रत का संकल्प यह करके करें कि हरतालिका व्रत सात जन्म अखंड सौभाग्य वृद्धि के लिए भगवान शिव व मां पार्वती का व्रत कर रही हूं। स्त्रियों को निराहार रहना होता है,संध्या समय स्नान करके शुद्ध व स्वच्छ वस्त्र धारण कर मां पार्वती तथा भगवान शिव की मिट्टी की प्रतिमा बनाकर पूजन की सम्पूर्ण सामग्री से पूजा करनी चाहिए। बीमार होने पर दूसरी महिला या पति या पुरोहित इस व्रत को रख सकते हैं। हरितालिका तीज का व्रत करने वाली महिलाओं को नए कपड़े पहनने चाहिए। इस दिन महिलाएं रंग-बिरंगे कपड़े पहनकर सोलह श्रृंगार करती हैं। इस दिन महिलाएं हाथों में मेहंदी भी लगाती हैं, जिसे सुहाग की निशानी माना जाता है।
यह

व्रत अत्यन्त कठिन व्रत होता है। यह व्रत दो प्रकार से किया जा सकता है़……. निर्जल और फलाहारी। निर्जल व्रत में अन्न फल यहां तक कि पानी भी नहीं पीते है, वहीं फलाहारी व्रत रखने वाली महिलायें व्रत के दौरान जल पी सकतीे हैं और फल का सेवन करती हैं, जो कन्याएं निर्जला व्रत नहीं कर सकती हैं तो उनको फलाहारी व्रत करना चाहिए।

हरतालिका तीज व्रत कथा
शास्त्रों के अनुसार, हिमालय की पुत्री माता पार्वती ने भगवान शंकर को पति के रूप में पाने के लिए अन्न त्याग कर घोर तपस्या शुरू कर दी थी। इस बात पार्वती जी के माता-पिता काफी परेशान थे। तभी एक दिन देवर्षि नारद जी राजा के पास पार्वती जी के लिए भगवान विष्णु की ओर से विवाह का प्रस्ताव लेकर पहुंचे। माता पार्वती ने यह शादी का प्रस्ताव ठुकरा दिया।पार्वती जी ने अपनी एक सखी से कहा कि वह सिर्फ शिव जी को ही पति के रूप में स्वीकार करेंगी। सखी की सलाह पर पार्वती जी ने घने वन में एक गुफा में भगवान शिव की अराधना की।

भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष के तृतीया के दिन हस्त नक्षत्र में पार्वती जी ने मिट्टी से शिवलिंग बनकर विधिवत पूजा की और रातभर जागरण किया। पार्वती जी के तप से खुश होकर भगवान शिव ने माता पार्वती को पत्नी के रूप में स्वीकार कर लिया था।और कहा की हे पार्वती! भाद्रपद की शुक्ल तृतीया को तुमने मेरी आराधना करके जो व्रत किया था, उसी के फलस्वरूप मेरा तुमसे विवाह संभव हुआ।

व्रत का फल
शास्त्रों के अनुसार भाद्रपद के शुक्ल पक्ष के तृतीया-चतुर्थी के दिन भोलेनाथ ने प्रसन्न होकर मां पार्वती को यह वरदान दिया था कि इस तिथि को जो भी सुहागिन अपने पति के दीर्घायु की कामना के साथ पूजन व व्रत व जागरण करेंगी, उनपर भगवान शिव प्रसन्न होते है।इस व्रत को करने वाली कुंआरी कन्याओं को भी मनोवांछित फल मिलता है इसलिए सौभाग्य की इच्छा करने वाली प्रत्येक युवती को यह व्रत पूरी निष्ठा तथा आस्था से करना चाहिए।

रवि शंकर पाण्डेय, ज्योतिषी
अक्षय ज्योतिष संस्थान

मोबाइल: 09795751332