जानें हर कोई क्यों लड़ना चाहता है प्रधानी चुनाव, विधायकों से ज्यादा कितनी निधि खर्च कर सकते हैं प्रधान?

लखनऊ: पंचायत चुनाव अपने शबाब पर है और गंवई राजनीति में दखल रखने वाला तकरीबन हर कोई चाहता है कि प्रधान की कुर्सी उसे मिले। इसके लिये साम, दाम, दंड, और भेद की नीति अपनाई जा रही है। गांवों में पंचायत चुनाव का क्रेज लोकसभा और विधानसभा चुनावों से बढ़कर दिख रहा है। सवाल ये उठता है कि आखिर ऐसा क्या है प्रधान बनने में। इसका जवाब है प्रधान को गांव के विकास के लिये मिलने वाला बजट। ग्राम प्रधान को गांव के विकास के लिये भारी-भरकम बजट मिलता है। यूपी में कुछ ऐसी भी ग्राम पंचायतें हैं जिनका बजट करोड़ों रुपये का है। यहां के ग्राम प्रधान 3 से लेकर 38 करोड़ रुपये तक चार्च करते हैं। इन जगहों पर प्रधानों की कुर्सी सांसद विधायक के आगे कहीं नहीं टिकती, लेकिन बजट के मामले में प्रधान उनसे कहीं आगे हैं।

सांसदों को जहां पांच करोड़ रुपये की निधि मिलती है। वहीं यूपी में कई ग्राम पंचायतें हैं जिनका बजट करोड़ों में है और इनसे काफी अधिक है। प्रदेश के एक दर्जन जिले तो ऐसे भी हैं जहां की 73 ग्राम पंचायतों के प्रधान विधायकों से भी ताकतवर होंगे। पद और कुर्सी में तो वह विधायक जी से कहीं पीछे होंगे, पर जब बात बजट की आएगी तो प्रधान विधायकों को काफी पीछे छोड़ देंगे। इनमें सबसे अधिक गोरखपुर की 37 और महाराजगंज की 15 ग्राम पंचायतें शामिल हैं। यही वजह है कि इन गांवों में प्रधानी के लिये जबरदस्त मुकाबला हो रहा है। नेता जहां जीत के जुगाड़ में हर दांव-पेंच आजमा रहे हैं तो वहीं इसमें वोटरों की बल्ले-बल्ले है।

दरअसल यूपी सरकार बेहतर काम करने वाली ग्राम पंचायतों को कुछ मानकों पर खरा उतरने पर परफाॅर्मेंस ग्रांट देती है, जो करोड़ों रुपये की होती है। सरकार का मकसद इस ग्रांट के जरिये ग्राम पंचायतों का माॅडल ग्राम पंचायत के तौर पर विकसित करना है। ऐसे गांव जिले स्तर पर चयनित किये जाते हैं। इसके बाद सूची मुख्यालय पहुंचती है जहां इसकी जांच कर अंतिम मुहर लगा दी जाती है।

बीते साल मार्च के महीने में उत्तर प्रदेश सरकार ने यूपी की 73 ग्राम पंचायतों का चयन कर वहां विकास के लिये 699.75 करोड़ रुपये की भारी भरकम धनराशि का बजट आवंटित कर दिया। ग्राम पंचायतों को 3 से लेकर 38 करोड़ रुपये तक की धनराशि आवंटित हो गई। पिछले साल अप्रैल के महीने में 50-50 लाख रुपये की पहली किस्त भी जारी हो गई। पर इन पंचायतों के प्रधानों को भारी भरकम बजट मिलने की खुशी से ज्यादा दुख इस बात का था कि उनका कार्यकाल बेहद कम बचा है। प्रधान जी पहली किस्त खत्म करते तो अगली किस्त मिलती, लेकिन इसके पहले ही उनका कार्यकाल ही खत्म हो गया।

अब ये करोड़ों का बजट नए प्रधान के हाथ में होगा। हालांकि ये बजट को कैसे खर्च करना है इसका गाइडलाइन और शर्तें व जवाबदेही सब तय है। पर अपने बजट के चलते वीआईपी ग्राम पंचायतें बन चुकी पंचायतों में ग्राम प्रधान बनने के लिये हर कोई एड़ी चोटी का जोर लगा रहा है।

यूपी में 15 जिलों की 73 ऐसी ग्राम पंचायतें हैं जिनका बजट करोड़ों रुपये का है। इनमें सबसे अधिक गोरखपुर की 37 और महाराजगंज की 15 ग्राम पंचायतें हैं। इसके अलावा मथुरा की पांच, बरेल और अलीगढ़ की तीन-तीन, आगरा से दो और मेरठ, बाराबंकी, बदायूं, आजमगढ़ व कुशीनगर से एक-एक ग्राम पंचायतें इसमें शामिल हैं। सबसे ज्यादा 38 करोड़ 84 करोड़ 84 लाख 96 हजार 776 रुपये ग्रांट मथुरा के गोवर्धन की अड़ीग ग्राम पंचायत का है। इसके अलावा गोरखपुर के पिपरौली ब्लाॅक अंतर्गत की रानी सुहास कुंवरि ग्राम पंचायत को 25 करोड़ से अधिक की परफाॅर्मेंस ग्रांट मिली है। इसी तरह गोरखपुर के पिपराइच ब्लाॅक के रुद्रापुर को 17.63 करोड़ रुपये की ग्रांट मिली है। इन गांवों में प्रधानी का चुनाव विधायकी के चुनाव से अधिक ग्लैमरस होगा। नए दावेदारों से लेकर निर्वर्तमान प्रधान सीट पर कब्जे के लिये ऐंड़ी चोटी का जोर लगा रहे हैं।